सब धोखा है ... मोह एक भ्रम || हिंदी कविता
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पाप के घड़े भर भी जाते हैं
गंगा में स्नान से कट भी जाते हैं
पाप पुण्य का क्या लेखा-जोखा है
मैं तो कहता हूं सब धोखा है ।
कण-कण में ईश्वर के अंश
प्राणी प्राणी में भगवान
छूत अछूत में क्या फर्क है बोलो
आखिर हैं ही सब इंसान
ऊंच-नीच का क्या लेखा जोखा है
मैं तो कहता हूं सब धोखा है ।
पढ़ लिख कर भी अनपढ़ सा ज्ञान
अक्ल बेचकर यहां बने महान
आंख बंद कर सब सत्य है बोलो
चल पड़ी है मूर्खों की दुकान
जीवन के इस भ्रम का क्या लेखा-जोखा है
मैं तो कहता हूं सब धोखा है ।
आकाश शून्य... पाताल शून्य...
शून्य में संसार रचा
कौन फरिश्ता मैं क्या जानूं
जन्म से मायावी यह संसार बसा
दुःख को दुःख ना समझे जो
सुख का फिर क्या लेखा-जोखा है
मैं तो कहता हूं सब धोखा है ।
©rakeshsinghsidar
#ज्यादा मोह रखना Injurious to health 😎
चाहे ईश्वर हो या इंसान

समाज को दर्पण dikhata लेखक
ReplyDelete👏👏 बहुत बहुत धन्यवाद
Deleteबहुत ही खुबसूरत रचना दादा 🙏🏻
ReplyDeleteधन्यवाद दादा 👏
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