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मातृभाषा " हिंदी " पर अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" की रचना

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पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा। पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा। हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा। बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती। कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती। आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नामही। इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही।1। जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला। जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला। उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी। उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी। जिसके तुतला कर कथन से सुधाधार घर में बही। क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं।2। दो सूबों के भिन्न भिन्न बोली वाले जन। जब करते हैं खिन्न बने, मुख भर अवलोकन। जो भाषा उस समय काम उनके है आती। जो समस्त भारत भू में है समझी जाती। उस अति सरला उपयोगिनी हिन्दी भाषा के लिए। हम में कितने हैं जिन्होंने तन मन धान अर्पण किए।3। गुरु गोरख ने योग साधाकर जिसे जगाया। औ कबीर ने जिसमें अनहद नाद सुनाया। प्रेम रंग में रँगी भक्ति के रस में सानी। जिस में है श्रीगुरु नानक की पावन बानी। हैं जिस भाषा से ज्ञान मय आदि ग्रंथसाहब भरे। क्या उचित न...